दास्ताँ- ए- दिल्ली
मेरे घर में अँधेरा है
उनके घर में दिवाली है
पे करता हूं मैं बिल बिजली का
वो फ्री में जलाती है
नहाया मैं नहीं बरसों से
गाड़ी उनकी रोज़ नहाती है
मेरी आँखों में (आंसू है )
कहती है जाओ छोड़ो- यह तो पानी है
रूपया अब तो – रोज़ गिरता है
चवन्नी अब नहीं चलती
अकड़ के कहती है – वो मुझसे
अब- दुनिया तेरे दम पे चल नहीं सकती (गरीब एक बोझ)
ढूंढ़ते-२ मैं मकानों को
मसानो तक में जा पंहुचा
भगा दिया उन्होंने वहां से भी (और बोला )
ठिकाना तेरा यहाँ हो नहीं सकता
रोज़ उडती है वो आसमानों पे
मैं जमीं पे भी चल नहीं सकता
यारों – मौसम तो है बारिश का
क्यों दिल्ली में बरस नहीं सकता
मेरे घर में अँधेरा है
उनके घर में दिवाली है
मेरी दास्ताँ -ए- दिल्ली सुनकर
झटक कर पल्लू वो बोली
वोट तो तेरा अब मुझे
एक दारू की बोत्तल में मिलता हैं
मेरे नसीब में दिवाली है
हां दिवाली है
गरीब- क्यों मुझसे जलता है
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