गज़ल
बहारें आयेंगी गुलशन में, भँवरे गुनगुनायेंगे
खिलेंगे फूल शाखों पर, परिंदे गीत गायेंगे
नहीं भूखा रहेगा कोई, आँखें नम नहीं होंगी
मचलते ख्वाब कहते हैं कि दिन ऐसे भी आयेंगे
बसे हैं दिल की धड़कन में, न हमको भूल पाओगे
छलक उठ्ठेंगी आँखें, याद जब हम तुमको आयेंगे
है दिल में हौसला, मेहनत का जज़्बा,अक्लो हिम्मत भी
क़दम उनके जहाँ में बढ़ते ही बढ़ते ही जायेंगे
जो सब तकदीर से मिलता है, तो रोने से क्या हासिल
अगर तदबीर से मिलती है मंज़िल, पा ही जायेंगे
ज़मीं के आदमी को आसमां हम सौंप कर खुश थे
हमें मालूम क्या था, वो ज़मीं को बेच खायेंगे
बहुत खामोश दिखते हैं ‘अनिल’ ये खंडहर, इनको
ज़रा छेड़ो तुम्हें ये दास्तां अपनी सुनायेंगे
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