कितने अजीब ये जिंदगी के रिश्ते होते हैं .
.कौन अपने और कौन पराये होते है..
आज भी पूछती है, बिदा होती वो गुड़िया रानी..
क्यूँ नहीं दिखता बाबा, मेरी आँखों से बहता पानी.
क्या नहीं हूँ , मैं आज आपकी आँखों का तारा..
क्यूँ कहते थे मुझे मेरा बेटा दुलारा.
जिस माँ की गोद में, बिता है बचपन सारा..
आज उसी ने कर दिया मुझको पराया..
जिन हाथों में बांधी थी, राखी ओ मेरे भाई..
क्या कर देगा उन्हीं हाथों से आज मेरी बिदाई..
जिस आँगन में गूंजती है मेरे बचपन की कहानी..
वो भी कह चला अलविदा ओ मेरी रानी...
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बह चली वो अपने ही अन्दर उमड़ते सवालों में..
खोजती रही अंतर अपने और परायों में..
बसानी है उसे एक दुनिया फिर से नई..
नये रिश्तों पर लिखनी है कहानी नई..
पर पूछता है, दिल ये कहीं.............................
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के कैसी है ये... रस्मों की विदाई ...
चंद वचनों में बिटिया हो गयी पराई...
ऋचा त्रिवेदी
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