पोटली
आज मैंने ताकपर रखी
पोटली को उतारा
सोचा था दिवाली है
कबाड़ बेच दूं
उसे फेकने से पहले
एक बार खोलना चाहा
बिलकुल वैसे जैसे
कहीं दूर जाते हुए
एक बार घर की और
पलट के देखने की
आदत हो जाती है
मन ने टोका भी
क्यूँ फिर से उलट पलट
कर के बिखेरना
काम वैसे ही बहुत है
पर सोचते सोचते
न जाने कब मुझसे
वो गाँठ खुल गयी
सामान सामने था
और मैं कहीं और
हाँ ताक पर रखी
इन चीज़ों की
काफी समय से
ज़रूरत नहीं पड़ी थी
मुझे याद भी नहीं था
क्या है और क्या नहीं
पर हर एक चीज़
जैसे जैसे आँखों के
सामने से गुजरी
मुझे याद आया कि कैसे
कभी इन्ही चीज़ों की
हसरत थी मुझे
पारकर की वो कलम
जिसकी कीमत देख कर
कई बार मैंने उसे
दुकान के काउंटर पर रख के
रेनोल्ड्स का उठा लिया था
एक डायरी जिसमे मैंने
अपने दोस्तों के नंबर
लिखे हुए थे
पुराने STD कोड
वाले नंबर जो हमेशा
मुझे ऐसे ही याद थे
उनमे से कुछ नंबर
और काफी लोग
अब बदल चुके हैं
एक टूटा हुआ
फोटो फ्रेम भी पड़ा था
उसके पीछे लिखा
हुआ था Friends forever
पर बहुत याद करने पर भी
याद नहीं आया मुझे
कि दिया किसने था
और कब शायद,
जो चीज़े हमेशा हमारी होती हैं
उन्हें नज़रंदाज़ करना
आसन हो जाता है
कुछ sketchpen
कुछ अखबार की कतरन
कुछ श्रृंगार की चीज़ें
जो मैंने १०-२० रुपये में
ले ली थी कमला नगर से
और मुझसे भी ज्यादा उन्होंने
उसे पहना था
कुछ पुराने registers
जिनमे लिखे नोट्स
न तब पढ़े न अब
पर हाँ उनके हाशिये पर
लिखे कुछ चुटकुले
आज भी गुदगुदा गए
तब एक दुसरे से कॉपी में
लिख के बात होती थी
आज SMS लिखना भी
बड़ा काम लगता है
मैं न जाने क्या क्या
सोचने लगी थी की
तभी एक कॉल आई
कुछ urgent काम था
मैंने पोटली को वापस बाँधा
और रख दिया
एक कोने में
मेरे कबाड़ी ने
जब तौल ली थी
सारी बाकी रद्दी
तो रुक कर पूछा
"कुछ और है"?
मेरी नज़र पोटली पर गयी
और मैंने कह दिया
अभी इतना ही
बाकी सामान
बाद में निकाल के
दे दूंगी
मुझे पता है
शायद अगली बार भी
वो पोटली
ताक पे ही रह जाएगी
पर शायद मेरा
बहुत कीमती कुछ
उसी कबाड़ में
सुरक्षित रखा है
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