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नन्ही जानवह नन्ही सी तो परी थी,उस बेचारी की क्या गलती थी।मान लिया उसने तुम्हे अपना,क्यों बिगाड़ दिया तुमने उसका सपना।उसके भोलेपन से तुमने खेला,अंदाज़ा तुम्हे है के कितना दर्द उसने झेला।अपनी दरिंदगी में उसके इज़्ज़त को लूटा,इंसानियत को तुमने कहलाया झूठा।शर्म आना चाहिए ऐसे लोगों को,जिन्होंने नोंच लिया उस बच्ची को।उस मासूम से उसका छीना बचपन ,तोड़ दिया उसके ख्वाबों का दर्पण।हसती-खेलती उम्र में कर लिया उसका शोषण,उसके हसिन ज़िन्दगी का कर लिया तुमने अपहरण।वो भी तो एक औरत है जिसके गर्भ से तुमने जन्म लिया,उस मासूम के चेहरे पर क्या तुम्हें ना दिखा अपने माँ का साया।चुरा लिया उससे तुमने उसका मुस्कान,और कितना गिरेगा तू बता ऐ इंसान।बन जाओ इंसान उस खुदा के वास्ते,वरना तू भी मरेगा किसी नन्ही जान के हाथ से।

nanhi pari

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नन्ही जानवह नन्ही सी तो परी थी,उस बेचारी की क्या गलती थी।मान लिया उसने तुम्हे अपना,क्यों बिगाड़ दिया तुमने उसका सपना।उसके भोलेपन से तुमने खेला,अंदाज़ा तुम्हे है के कितना दर्द उसने झेला।अपनी दरिंदगी में उसके इज़्ज़त को लूटा,इंसानियत को तुमने कहलाया झूठा।शर्म आना चाहिए ऐसे लोगों को,जिन्होंने नोंच लिया उस बच्ची को।उस मासूम से उसका छीना बचपन ,तोड़ दिया उसके ख्वाबों का दर्पण।हसती-खेलती उम्र में कर लिया उसका शोषण,उसके हसिन ज़िन्दगी का कर लिया तुमने अपहरण।वो भी तो एक औरत है जिसके गर्भ से तुमने जन्म लिया,उस मासूम के चेहरे पर क्या तुम्हें ना दिखा अपने माँ का साया।चुरा लिया उससे तुमने उसका मुस्कान,और कितना गिरेगा तू बता ऐ इंसान।बन जाओ इंसान उस खुदा के वास्ते,वरना तू भी मरेगा किसी नन्ही जान के हाथ से।

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ओ मेरी सरकारये भी बंद कर दे, व भी बंद कर देरोजगार भी बंद कर दे,केवल भाषण दे दे,गपसप चला दे।जहाँ भी जाऊँएक घूँट चाय पिऊँ,और लम्बी हाँक करतन कर सो जाऊँ।जनता रोये तो रोयेचुनाव में पिटे तो पिटे,ओ मेरी सरकारये भी बंद कर दे, व भी बंद कर दे,अठन्नी -चवन्नी इधर भी खिसका दे।*महेश रौतेला

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यादें:यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ,भारी नहीं हैं पर बहुत हल्की भी नहीं हैं,खो भी गयी हैं पर खोजी भी गयी हैं,जहाँ पर खड़ा हूँ, वहाँ पर नहीं हैं,पर जगमगाते हुए समय पर दिखी हैं,किसकी कितनी बाँटें,बाँटो तो नहीं बँटती,कठोरता नहीं है, सब कोमल हो चुकी हैं,यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ।वह साफ गुनगुनी धूप, वह क्षण भर का साथ,इतने लम्बे सफर का साथी बन गया है।कहो तो मिटा दूँ पर मिटता नहीं है,न चाहते भी मन में रह गया है।ये रोगियों की पंक्ति, ये रोगों का जमघट yuयादों में घुसपैठ लगाये हुए हैं,सीमा पर तैनात यादों के सिपाहीडटकर खड़े सामना कर रहे हैं,ये टोकरी में नहीं कि किसी को दे दूँमेरी ईहा को जगाये हुए हैं,यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ।***महेश रौतेला

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