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"ऊपर वाले को तार"
खीझ तो जाते होगे ना तुम
जब दूध दही और बेल पत्रो से तुम्हें रगड़ते हैं
तुम्हारे ही बाग से फूल नोचकर
तुम पर ही नज़र करते हैं
कभी मंगला में सुबह चार बजे
कभी अज़ान में रोज़ाना पाँच दफे
तलवे घिसते आते हैं फ़रियादी मीलो से
गीली आँखो से गिरती इनकी मन्नते कबूलो
नहीं तो भक्तों की बेरूख़ी झेलो
तुम्हारे पल्लू से बाँध जाते हैं ये
अपने दर्द और अपनी फिकर कसकर
कुछ भी माँग लेते हैं,बड़े मँगते हैं
ना दो तो तुम्हारी शामत
और देने पर फिर हजम ना हो
तब भी तुम पर ही तोहमत
एक बार आ जाओ और सबको बता जाओ
"चिराग घिसने से नहीं निकला
खुदा हूँ मैं
तेरी आहें सुन कर आया हूँ
तुम्हारी ज़रूरतें तुम से बेहतर जानता हूँ
जिन्न नहीं की हर हुक्म बजाऊं
गुलाम नहीं हूँ तेरा
की तेरी हर मुराद का मुरीद हो जाऊं"
खैर.......
एक बार आ जाओ और गाइड्लाइन्स फिर से बता जाओ
बंसी छोड़ो और चक्र चला दो
आप बिज़ी हो तो नंद बाबा ही भिजवा दो
अगले पिछ्ले जन्म का छोड़ो
सब इसी जन्म में करवा दो
यहाँ के हालात बहुत संगीन हैं
आपके अस्तित्व पर भी प्रशन्चिन्ह है
थोड़ा लिखा ज़्यादा समझना
बाकी तो आप खुद भगवान हैं

"??? ???? ?? ???"

Poems 0

उसने मैसेज बॉक्स में अपना संदेश टाइप किया. दो बार उसे ध्यान से पढ़ा. सब सही था. वही लिखा था जो वह कहना चाहता था. किंतु  'सेंड' का बटन दबाना उसके लिए कठिन हो रहा था. पता नही संदेश पढ़ कर उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी. यदि वह नाराज़ हो गई तो. उसके साथ दोस्ती तोड़ दी तो. उसके एकाकी जीवन में उसकी दोस्ती ही है जो कुछ सुकून देती है. ये उसकी बातें ही तो हैं जो उसके बेरंग जीवन में खुशियों के रंग भरती हैं. यदि सब समाप्त हो गया तो. यही डर उसे संदेश भेजने से रोक रहा था.
उसके आस पास के सभी लोग अपने जीवम में व्यस्त थे. उसके सभी दोस्तों व भाई बहनों की शादियां हो गई थीं सब अपने परिवार के साथ खुश थे. ऐसा नही था कि उसके पास कोई काम नही था. ऑनलाइन वित्तीय सलाहकार होने के साथ वह एक फ्रीलांस लेखक था. लेकिन काम से फुर्सत मिलने के बाद ऐसा कोई नही था जिसके साथ वह अपने दिल की बात कह सके. इसने उसके जीवन के खालीपन को और बढ़ा दिया था.
अपनी व्हीलचेयर पर बैठ कर ही वह अपने भाई बहनों के साथ बचपन का आनंद लेता था. स्कूल के मित्रों के साथ कुछ एक अवसरों को छोड़ दें तो उसे अपनी अक्षमता का एहसास कम ही होता था. लेकिन किशोरावस्था में कदम रखने पर स्थितियां बदलने लगीं. उसके मित्रों के जीवन में कई नए आयाम जुड़ने लगे. ऐसे में वह स्वयं को अलग थलग महसूस करने लगा. अब अक्सर ही उसे अपनी अक्षमता का एहसास होता था.
उसके सभी मित्रों की कोई ना कोई गर्लफ्रेंड थी. वह भी लड़कियों के साथ मित्रता करना चाहता था. किंतु स्वयं की शारीरिक स्थिति के कारण अपनी बात कहने में उसे संकोच होता था.
ग्यारहवीं में उसकी कक्षा में एक नई लड़की ने प्रवेश लिया. चश्मा लगाए सांवली सी ये दुबली पतली लड़की अपने आप में ही रहती थी. तीन महिनों में उसका कोई मित्र भी नही बना था. उसे लगता था कि वह भी उसकी तरह अकेली है. अतः उसने फैसला किया कि वह उसके साथ मित्रता करेगा. फ्रेंडशिपडे पर उसने एक अच्छा सा कार्ड बनाया और उस पर एक सुंदर सा संदेश लिखा. मौका देख कर उसने वह कार्ड उस लड़की को दे दिया. उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा.
कार्ड देख कर उस लड़की के चेहरे पर कोई भी भाव नही आया. ना ही वह क्रोधित हुई ना ही कोई सहानुभूति दिखाई और ना ही उसका उपहास किया. उसने कार्ड को उलट पलट कर इस प्रकार देखा जैसे वह कोई बेकार काग़ज हो और फिर उसकी गोद में डाल कर आगे बढ़ गई. उसके इस व्यवहार ने उसे और भी आहत किया.
ग्यारहवीं का वह साल उसके लिए बहुत मुश्किल रहा. परीक्षा में उसके अंक भी बहुत कम आए.
लेकिन बारहवीं में उसने खुद को संभाल लिया और पूरी तरह से पढ़ाई में जुट गया. अपनी मेहनत व लगन से उसने स्वयं का एक स्थान बना लिया. किंतु उसकी दुनिया बहुत सीमित हो गई थी. कुछ एक करीबी लोगों को छोड़ कर वह किसी के साथ घुल मिल नही पाता था. स्त्रियों के साथ तो वह और भी अधिक असहज हो जाता था. अपनी इस तंग दुनिया में उसे घुटन सी महसूस होने लगी थी. वह इससे बाहर आना चाहता था. किसी के साथ अपना अकेलापन बांटना चाहता था.
एक दिन उसकी नज़र एक इंटरनेट साइट पर पड़ी. यहाँ पर अपने मित्र बना कर उनके साथ चैट कर सकते थे. उसने अपना एकाउंट खोल लिया. अपना प्रोफाइल बनाते हुए उसने अपनी शारीरिक स्थिति को छुपाने का प्रयास किया अतः अपनी ऐसी तस्वीर लगाई जिससे कुछ पता ना चले. धीरे धीरे उसके मित्र बनने लगे. किंतु उसे एक महिला मित्र की तलाश थी जिसके साथ वह खुल कर बात कर सके. उसकी तलाश एक चेहरे पर जाकर खत्म हुई. उसे लगा कि यही है वह जिसकी उसे प्रतीक्षा थी. उसकी उम्र छब्बीस साल थी. किसी पबलिशिंग हाउस में काम करती थी. उसने रिक्वेस्ट भेज दी. अगले ही दिन उस लड़की ने उसकी रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. दोनों में बातचीत का सिलसिला आरंभ हो गया. समय के साथ साथ उसका विश्वास पक्का हो गया कि उसने सही लड़की को चुना है.
लगभग रोज़ ही उनकी चैट होती थी. कई मुद्दों पर दोनों की सोंच एक थी और कई पर जुदा. कई बार उनमें बहस भी होती थी. लेकिन वह उस वक्त का इंतजार बेसब्री से करता था जब वह ऑनलाइन आती थी. अब वह अपने भीतर एक बदलाव महसूस करने लगा था. लोगों के साथ बिना संकोच सहजता से बात कर पाता था. उसका आत्मविश्वास बढ़ने लगा था.
इसके बावजूद एक बात उसके दिल में कचोटती थी. वह अपनी वास्तविक स्थिति छुपा रहा था. पता नही उस लड़की के मन में उसकी क्या छवि होगी. अपनी वास्तविक स्थिति ना बता कर वह झूठ बोल रहा है. झूठ पर टिका रिश्ता सही नही है. प्रारंभ में उसने इस आवाज़ को दबाने का प्रयास किया लेकिन वह दबने की बजाय और मुखर हो गई.  अतः उसने अपने बारे में सब कुछ बताने का फैसला कर लिया.
सब कुछ उसने मैसेज बॉक्स में लिख दिया किंतु संदेश भेजने में वह डर रहा था. उसके मन में कश्मकश थी. वह किसी फैसले पर नही पहुँच पा रहा था. तभी उसके भीतर से एक आवाज़ आई 'किस बात का डर है तुम्हें. यही कि वह अस्वीकार कर देगी. पर सोंच कर देखो कि क्या आवरण के पीछे छुप कर तुम स्वयं को ही अस्वीकार नही कर रहे हो'.
सारा असमंजस समाप्त हो गया. उसने बिना किसी विलंब के 'सेंड' बटन दबा दिया. अब वह किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार था.
दो दिन तक कोई जवाब नही आया. तीसरे दिन इनबॉक्स में उस लड़की का संदेश था.
डियर फ्रेंड
तुम्हारा संदेश मिला. तुमने जिस ईमानदारी से अपने बारे में बताया वह मुझे अच्छा लगा. हमारे बीच जो बातें हुईं उनके कारण मुझे सदैव ही तुममें एक अच्छा इंसान नज़र आया. यही हमारी दोस्ती का आधार रहा है. तुमने मुझे जो बताया उससे हमारी दोस्ती पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा. बल्कि तुम्हारी ईमानदारी ने तुम पर मेरे विश्वास को और बढ़ा दिया है.
संदेश पढ़ कर उसे तसल्ली हुई. उसने तो स्वयं को स्वीकार कर लिया था किंतु उसकी दोस्त द्वारा स्वीकार किए जाने से उसे और बल मिला.

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