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तारीफे मजदूर


दफ्तर  की  खिड़की  से  देखा  जब
एक  मजदूर  था  बैठा  तब
चिलचिलाती  धूप में  खिलखिला  रहा  था
पैसों  के आभाव  में  भी मुस्कुरा  रहा  था
आँखों  में  माटी  की  चमक  छाई थी
मानो  जैसे  इंद्रधनुष  की  किरणे  आई  थी
तब  मैंने  जाना  की  तारीफें  भी  तकदीरें  हैं
इमारतों  की  उचाईयों  में  मजदूर  कहीं  छिपा  जा रहा है
तारीफे  काबिल है  वो  जो  बेहतरीन  इमारतें  बुना  जा  रहा  है
तेरी  तारीफ़  में  लिख  न  सके  नग्में  और  तराने
चाहे  ईमारत  बनाते  हुए  कितनी  ही  गई  मासूम  जाने
है  हौंसला  ऐसा  उसमे  गिर  गिर के  फिर  उठ  रहा  है 
प्रशंसा  के  बिना  ही  प्रेरित  हुआ  जा  रहा  है
आज समझा मैंने, है मेरे  पास  ईमारत  बड़ी 
किन्तु  मेरी  खुशियों   की  चादर  है  उससे  छोटी
ऐ  मजदूर  है  तेरी  ताकत   बड़ी
खुशियों  की  चाबी  है  तूने  धीरता   से  भरी
करती हूँ तुझे सलाम ए मजदूर
तेरे हौंसलो की ताकत है भरपूर।

TAARIFEY MAJDOOR

Poems 8

आज फिर दिल ने ख्वाहिशें  की हैं
आज फिर दिल ने मन्नतें की हैं ।
एक चेहरा है सामने मेरे
जिसने ज़िन्दगी में जन्नतें की हैं ।


कब से सोचा था जिसे तसव्वुर में
आज आया है वो मेरी नज़र में
ऐसा लगता है जैसे वो मेरा हमसाया हो
साथ रहने का मुझसे वादा ले के आया हो
ऐसी बेहतर उसने मुझको सौगातें दी हैं ।


उसका वो रंग हरा कपड़ों का
जैसे हो रंग सुर्ख पेड़ों का
उसकी आँखों की चमक ऐसी है
जिसने मेरे दिल में चमक बिखेरी है
साथ पाने का उसका दिल ने हसरतें की हैं ।

 

उसका शर्माना, इतराना अपनी बातों पर
मेरी बातों को भी सुनना करता है क़ायल
जैसे अनजाने में उसने खुद को जोड़ लिया
मैंने भी राहों को उसकी तरफ मोड़ लिया
ज़िन्दगी साथ में जीने की सिफ़ारिश की है ।

Aaj Phir

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