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आज देखा तुम्हें तुम थे खोये हुए
जाने किस हाल में तुम थे हँसते हुए
तुम थे रोते  हुए
आज देखा तुम्हे…………………………………..

बात कोई भी हो साथ मेरा रहे
रब से जब हो दुआ दिल तो बस ये कहे
चाहे खुशियों को मुझसे बचा लोगे तुम
पर न ग़म को मुझसे छिपा पाओगे
ज़िन्दगी में अँधेरा हो कितना घना .........
रोशनी की किरण मुझसे तुम पाओगे।
आज देखा तुम्हे……………………………………………..

दिल की गहराई से प्यार तुमसे किया
पर न तुमने ये दिल को समझने दिया
जाने क्या हैं तुम्हारी ये मजबूरियाँ
जिस वजह से हैं की तुमने ये दूरियाँ
यूँ ही मेरी मोहब्बत रहेगी जवाँ .........
चाहे तुम इस जहाँ में रहो भी जहाँ
आज देखा तुम्हे……………………………………
                                    
-मोहित खरे

AAJ DEKHA TUMHE ..

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एक प्रेम पत्र:

अनिरुद्ध एक प्रेम पत्र लिख रहा था। रात के ग्यारह बजे थे। उसने आधा पन्ना लिखा था। फिर उसकी आँख लग गयी। दो घंटे बाद नींद खुली तो देखा कि पत्र पूरा लिखा हुआ उसके सामने था।  वह आश्चर्य में डूब गया। एक अदृश्य शक्ति उसका हाथ चला रही थी।
उसे ख्याल आया कि उसके समय कैसा प्यार होता था,धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता। इतना धीरे-धीरे कि बुढ़ापे तक एक-दूसरे तक आवाज न पहुंचे।यदि किसी ने कह भी दिया तो दूसरा अनसुना करने के अंदाज में हो जाता था।प्यार अनार के दानों की तरह हृदय में पक कर लाल हो जाता था।
वह सीढ़ियां चढ़ा। सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते उसकी सांस भी फूल रही थी। उसे लग रहा था जिन सीढ़ियों को वह कभी अवरोध नहीं मानता था वे आज हिमालय सी कठिन हो गयी थीं। ऊपर पहुंच कर उसने देखा जिस घर को देखने वह आया है वहां पर खेत दिख रहा है। कुछ सब्जियां उसमें उगी हैं। उसने आह भरी, विस्तृत आकाश को देखा। पचास साल पहले भी वहीं पर खड़ा होकर वह तारों से झिलमिल आकाश को देखा करता था। उसने अपनी डायरी निकाली और उसमें लिखने लगा।
"प्रिय,
मैं पचास साल बाद तुमसे मिलने आया हूँ। कभी समय ही नहीं मिला। इतना व्यस्त रहा कि यहाँ तक पहुंच नहीं सका। तुम पढ़ने में कमजोर थी और ठीक से सुन भी नहीं पाती थी। मैं जब तुम्हें पढ़ाता था तो असीम आनंद का अनुभव करता था। तुम बाजार से छोटी-बड़ी चीजें मुझसे मँगवाया करती थी। मुझे तुम्हारा काम करना अच्छा लगता था। जब मैं अन्तिम बार तुमसे विदा हुआ था तो तुम बहुत रोयी थी। मैं उदास था पर रोया नहीं था। आज में देखने आया था कि तुम कैसी हो। तुमने जब मुझे फूल दिया था ,मैंने उस फूल को तुम्हारे बालों में रोप दिया था। शायद, तुम उस फूल की तरह खिलती, मुस्कराती रही होगी।" वह लिख रहा था तभी वहां पर एक आदमी आया। उसने अनिरुद्ध से पूछा," क्या काम है? आप कौन हो?"  अनिरुद्ध बोला," अदिति रहती थी यहाँ, उससे मिलने आया हूँ।" वह आदमी बोला," उसकी कैंसर से मृत्यु हो गयी है। एक साल हो गया है। किसी को बहुत याद करती थी। एक पत्र छोड़ कर गयी है।"
वह आदमी आगे कहता है ," लोगों का लगता है कि वह कभी-कभी यहाँ रात में आती है।" अनिरुद्ध को यह सुनकर आश्चर्य होता है। साथ ही उसे उसकी बात सच लगती है क्योंकि जब भी वह प्रेम पत्र लिखता है एक अदृश्य शक्ति उसके पत्र को पूरा कर देती है।

**महेश रौतेला

Aik Prem Payra

Short Stories 1

चिल कर ले

दिल बोले मेरा, थोड़ा चिल कर ले
बढ़ना है आगे तो , थोड़ा विल कर ले
लगा के अरमा को ,पंख तू उड़ने दे
आसमा को भी राहों में जुड़ने दे
मिली है तुझको ज़िन्दगी, थोड़ा थ्रिल कर ले

दिल बोले मेरा, थोड़ा चिल कर ले..

ऐ ज़िन्दगी, तेरा शुक्रिया, तूने है जो कुछ दिया
जीना है तो हस के जिले,चेहरे पे ला मस्तियाँ
मुश्किल अगर , है तेरी डगर,राहों को आ मोड़ दे हम
रिश्तों की डोर न टूटे कभी, बंधन को आ जोड़ दे हम
ख़ुशी यह बोले सबसे, थोड़ा मुस्कुरा
आने वाले पल को न तू ठुकरा
किस्मत  के ताले , आज तो खुलने दे
मेहनत की खुश्बू, हवा में घुलने दे
देखे हैं तूने ख्वाब जो, पूरा कर तू आ

दिल बोले मेरा, थोड़ा चिल कर ले

ऐ यार सुन, मीठी सी धुन, कहती हैं क्या यह फ़िज़ाएं
करना है जो, तू ठान ले, आ मोड़ दे यह हवाएं
गुज़रा हुआ वक़्त आता नहीं, आता नहीं है वह पल
आज में ही तू जिले यारा,सोच न होगा क्या कल
साँसे यह बोले मुझसे धड़कन की सुन जा
कर कुछ ऐसा यारा  , हर दिल में बस जा
सजा के सपनो को, उड़ान तू भर ले
ज़मी से लेकर तू, आसमा छुले
खोल के बाहें  सबको, अपना तू बना

दिल बोले मेरा, थोड़ा चिल कर ले

chill kar le

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