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आज देखा तुम्हें तुम थे खोये हुए
जाने किस हाल में तुम थे हँसते हुए
तुम थे रोते  हुए
आज देखा तुम्हे…………………………………..

बात कोई भी हो साथ मेरा रहे
रब से जब हो दुआ दिल तो बस ये कहे
चाहे खुशियों को मुझसे बचा लोगे तुम
पर न ग़म को मुझसे छिपा पाओगे
ज़िन्दगी में अँधेरा हो कितना घना .........
रोशनी की किरण मुझसे तुम पाओगे।
आज देखा तुम्हे……………………………………………..

दिल की गहराई से प्यार तुमसे किया
पर न तुमने ये दिल को समझने दिया
जाने क्या हैं तुम्हारी ये मजबूरियाँ
जिस वजह से हैं की तुमने ये दूरियाँ
यूँ ही मेरी मोहब्बत रहेगी जवाँ .........
चाहे तुम इस जहाँ में रहो भी जहाँ
आज देखा तुम्हे……………………………………
                                    
-मोहित खरे

AAJ DEKHA TUMHE ..

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तीन पत्थर:

क्रिस्चन हैस्केट्स जो यूएसए में प्रोफेसर हैं अपने विद्यार्थियों के साथ हर साल वाराणसी आते हैं। वाराणसी के शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि वह हर साल बढ़ता है और कोई आक्रमणकारी अतीत में उसे तोड़ नहीं पाया। प्रोफेसर अच्छी खासी हिन्दी बोल लेते हैं। उनका कहना है कि वे जीवन के रहस्यों को समझने यहाँ आते हैं। उनके विचार सुन, मुझे अपना गांव याद आ गया। तीन नदियां हैं। विस्तृत वन क्षेत्र है। दो नदियों का संगम पहले है।  तीसरी नदी थोड़ी दूरी पर इनसे मिल जाती है। वहाँ पर श्मशान भी है। पहाड़ियों से दौड़ती ये नदियां मन को मोहती हैं और उनकी कल-कल, मधुर संगीत सा, जीवन में जब-तब मिलता रहता है। घराट , श्मशान से थोड़ी दूरी पर है।घराट पर गांव के किस्से-कहानियां सुनी-सुनायी जाती हैं। दो पहाड़ियों के बीच की पगडंडियां अनेक अद्भुत, अनिर्वचनीय दृश्य दिखाती हैं। एक दिन मेरा दोस्त इसपार की पहाड़ी की पगडण्डी पर जा रहा था। उसने देखा दूर उस पार की पहाड़ी के एक पेड़ पर, एक आदमी लटक रहा था। जिस टहनी पर वह लटका था, उससे वह धीरे-धीरे नीचे को झुका जा रहा था। वह आगे बढ़ता गया। नदी के किनारे मैदानी क्षेत्र पर, तीन विशालकाय पत्थर लगभग दो-दो सौ मीटर की दूरी पर हैं। वह एक पत्थर पर चढ़ा और उस आदमी को देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसे लगा पत्थर से एक आवाज आ रही थी," वह आदमी मर रहा है, उसे बचा लो।" मेरा दोस्त पत्थर से उतरा और दूसरे पत्थर की दिशा में दौड़ा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि वह आदमी दिख नहीं रहा है अत: वह दूसरे पत्थर पर चढ़ा और उसे देखने की कोशिश करने लगा। बहुत देर तक वह इधर-उधर देखता रहा लेकिन कुछ पता नहीं चला। थक कर वह पत्थर पर बैठ गया। थोड़ी देर में उसे लगा पत्थर से एक आवाज आ रही है," देखो, वह आदमी बच गया है, वह मर रहा था। वह नदी के किनारे-किनारे चल कर श्मशान की ओर जा रहा है। उसे बचा लो। " उसने उधर देखा तो सचमुच वह आदमी श्मशान की ओर जा रहा था। मेरा दोस्त उस ओर जाने लगा। थोड़ी देर में फिर उसने देखा, वह आदमी वहां नहीं था। वह जब तीसरे पत्थर पर पहुंचा तो उसमें चढ़ कर देखने लगा। तभी पत्थर से एक आवाज आयी," देखो, उस आदमी की इच्छायें श्मशान में हैं,इसलिए वह श्मशान की ओर जा रहा है। तुम उसकी सहायता करो।" मैंने अपने दोस्त से पूछा," क्या पत्थर बोल सकते हैं?" उसने कहा," हाँ, प्यार की तरह,मेरा अनुभव यही कहता है।"  मैं सोच रहा हूँ, कैसे वाराणसी का शिवलिंग बढ़ रहा है,और कैसे पत्थरों से शब्द निकलते हैं?
**महेश रौतेला

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