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jitna भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत कम लगती है
जितना भी में   सोचु तुम्हे , मेरी सोच यह कम लगती है
लगती है मुझे, जो भी ओ सनम, क्या तुमको भी कम लगती है
जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत कम लगती है...

मैंने तुम्हे चाहा सनम,तू ही बता दे मेरी खता
तुझसे ही है यह, मेरी चाहत, तुझसे ही है यह मेरी वफ़ा
रात दिन तेरे बिन, कटते नहीं है यह पल
इक पल की भी दूरी अब तो सनम लगती है सदियों जैसी
धड़कन भी अब  तो तेरे बिना  , धड़कती नहीं पहले जैसी
हाले दिल क्या काहू, बिन तेरे न राहू
क्या हाल भी तेरा कुछ ऐसा है.

जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत काम लगती है

मेरे लिए है तेरी मोहब्बत, जैसे हो कोई इबादत
चाहूंगा तुझको साड़ी उम्र भर ,दे दे मुझको तू इज़ाज़त
ज़िन्दगी के सफर ,आ संग चले हमसफ़र
यह रात है जो ठहरी हुई, आ इसको सजा दे हम दोनों
सपने है जो देखे सभी, आ सच कर जाएँ हम दोनों
खुशियां जो थी यहां, जाने है अब कहाँ
क्या तुमने कहीं इन्हे देखा है

जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत काम लगती है

chahat

Lyrics 0

हा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारा
पर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।

तस्वीर ये नहीं है अब तक हुई मुकम्मल
अब तक नहीं बना है ख़्वावें जहां हमारा


हाकिम अभी वही है बस रंग बदल गया है
अब भी  कहा मिला है हमको चमन हमारा


हम ढूंढते वतन को सरहद की लाइनों में
तारीख में कभी, किताबी मायनों में
अहल-ए- वतन बताओ क्या है वतन हमारा

मजहब सिखा रहा है आपस मे बैर करना
नफरत जला रही है चैनों अमन हमारा

पर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमां का।
शर्मिंदा है वो हमसे वो संतरी हमारा

हा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारा
पर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।

ग़ुर्बत में है वतन पर हमको नही पड़ी है।
हो जाति धर्म या के हो रंग क्षेत्र भाषा
वो जो हो सबसे छोटा, है दायरा हमारा


यूनान, मिस्र, रोमा सब थे चले जहां से।
अब तक वहीं खड़ा है। ये कारवां हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी
जो आज तक लड़े है उनको नमन हमारा ॥

'इक़बाल' ढूंढता क्यों मरहम कहीं जहां में।
मालूम है उसे जब  दर्दे निहां हमारा ॥

::::::अमित:::::

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