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"ऊपर वाले को तार"
खीझ तो जाते होगे ना तुम
जब दूध दही और बेल पत्रो से तुम्हें रगड़ते हैं
तुम्हारे ही बाग से फूल नोचकर
तुम पर ही नज़र करते हैं
कभी मंगला में सुबह चार बजे
कभी अज़ान में रोज़ाना पाँच दफे
तलवे घिसते आते हैं फ़रियादी मीलो से
गीली आँखो से गिरती इनकी मन्नते कबूलो
नहीं तो भक्तों की बेरूख़ी झेलो
तुम्हारे पल्लू से बाँध जाते हैं ये
अपने दर्द और अपनी फिकर कसकर
कुछ भी माँग लेते हैं,बड़े मँगते हैं
ना दो तो तुम्हारी शामत
और देने पर फिर हजम ना हो
तब भी तुम पर ही तोहमत
एक बार आ जाओ और सबको बता जाओ
"चिराग घिसने से नहीं निकला
खुदा हूँ मैं
तेरी आहें सुन कर आया हूँ
तुम्हारी ज़रूरतें तुम से बेहतर जानता हूँ
जिन्न नहीं की हर हुक्म बजाऊं
गुलाम नहीं हूँ तेरा
की तेरी हर मुराद का मुरीद हो जाऊं"
खैर.......
एक बार आ जाओ और गाइड्लाइन्स फिर से बता जाओ
बंसी छोड़ो और चक्र चला दो
आप बिज़ी हो तो नंद बाबा ही भिजवा दो
अगले पिछ्ले जन्म का छोड़ो
सब इसी जन्म में करवा दो
यहाँ के हालात बहुत संगीन हैं
आपके अस्तित्व पर भी प्रशन्चिन्ह है
थोड़ा लिखा ज़्यादा समझना
बाकी तो आप खुद भगवान हैं

"??? ???? ?? ???"

Poems 1

वफादार
चंद बूँदें झलकी चेहरे पर उसके,
फिर भी कोई अहसास नहीं,
शरीर तो हैं किनारे समुन्दर के,
पर खोए मन का आस पास निशान नहीं |
डूबा हैं आज भी उन्ही आँखों के अहसास में ,
भीग रहा हैं उन्ही जुल्फों की बरसात में,
मुट्ठी में समेट रहा हैं यादो को,
जो रेत की भाँति फिसल गयी |
गज़ब ही इश्क़ रूह से किया उसकी,
जिसका शरीर राख बन शमशान में हैं पड़ा,
फिर भी कहता हैं शरीर में क्या रखा हैं,
आत्मा का मिलन जब हो चूका |
नूरानी चेहरा निहार रहा हैं जिसका कोई अस्तित्व नहीं ,
कर रहा हैं बयान सर से पाँव तक मानो सामने उसके हो साक्षात् खड़ी |
लोग आवारा पागल कहते हैं उसे,
पर इस खिड़की से मुझे कोई वफादार वो लगता हैं ,
पुकारा तारीफ़ वफादारी की उसकी करने को,
बेसुध सा वो चला गया छोड़ पीछे उसकी तारीफ़ करती मुझ दीवानी को .....

vafaadar

Poems 3

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