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ध्यान...
स्वामी प्रेम अरुण रोज़ सुबह महावीर गार्डन आते हैं|उनके अनुसार यहाँ सुबह सुबह प्रकृति के नज़दीक ध्यान करना उन्हें स्वयं के और नज़दीक ले जाता है|आज वे अपने साथ निशांत को भी लाये हैं,ध्यान के बारे में सुनकर उसकी रूचि उत्पान्न हो गयी तो चला आया साथ में|”ध्यान एक बहुत गहरा अनुभव है बेटा,ध्यान की अवस्था में हम किसी और ही तल पे होते हैं,बाहरी दुनिया से वास्ता खत्म,किसी का कोई प्रभाव नहीं,स्वयं के करीब..”कहते हुए स्वामी जी बढ़े जा रहे थे अपने पीपल के पेड़ की ओर|यही स्वामी जी की ध्यानस्थली थी,रोज़ यहीं ध्यान करते थे उनके अनुसार यहाँ कुछ विशेष ऊर्जा विकसित हो गयी थी|”तो ये गहरा अनुभव होता कैसा है,आपको तो हुआ ही होगा,इतने समय से आप ध्यान कर रहे हैं”,निशांत पूंछ बैठा|”अनुभव बतलाया थोड़े ही जा सकता है, वो तो महसूस करने की चीज़ है”|हालाँकि निशांत इस उत्तर से संतुष्ट तो नहीं था पर मान गया,आखिर इसे नापने का कोई पैमाना भी तो न था|स्वामी जी अपने पीपल के पेड़ के नीचे पहुच चुके थे, निशांत के मन में प्रश्न घूम रहे थे,आखिर इस गहरे अनुभव की पुष्टी कैसे हो ,क्या इस तरह कोई भी स्वयं को गहन ध्यानी नहीं कह सकता आदि आदि प्रश्न उसके मन में हलचल मचा रहे थे|स्वामी जी पीठ सीधे कर,हाथों को घुटनों पे रखते हुए ध्यान की मुद्रा में बैठ गए|”अब मैं ध्यान में दुनिया में जाने वाला हूँ,बाहरी दुनिया का जहाँ कोई प्रभाव नहीं है, परम सुख और शांति की ओर”कहते हुए स्वामी जी ने आँखें मूँद लीं|निशांत उन्हें देख रहा था,उनके हाव भाव से से लग तो रहा था की वे एकदम शांतचित्त हो चुके हैं,उनकी लम्बी लम्बी साँसों पे गौर करते हुए निशांत सोच रहा था की शायद वास्तव में ही स्वामी जी किसी गहरे अनुभव से गुज़र रहे हैं,उनके चेहरे के भाव भी इस बात की पुष्टी सी कर रहे थे|निशांत अपने विचारों में गुम ही था की तभी पास खेल रहे बच्चों की गेंद स्वमी जी सिर पर आकर लगी,स्वामी जी हडबडा के उठे,चेहरे का शांत भाव उड़ने में पल भर भी न लगा,उसकी जगह अब क्रोध ने ले ली थी|”अरे इतने बड़े पार्क में एक ये ही जगह है क्या खेलने के लिए..!!”,स्वामी जी क्रोध से चिल्लाये,उनकी धीमी लम्बी सांसें अब तेज़ हो चुकी थीं,आँखें क्रोध से लाल,विचलित|बच्चे तो तब तक अपने अपने ठिकाने ढूंड कर उनमे छुप ही चुके थे|”बड़े बदतमीज़ बच्चे हैं,दिख नहीं रहा क्या,यहाँ मैं ध्यान कर रहा हूँ,पता नहीं इनके माँ बाप कैसे इन्हें यहाँ सुबह सुबह खेलने भेज देते हैं”,कहते हुए स्वामी जी वहीँ पेड़ के नीचे बैठ गए और बच्चों की गेंद कभी वापस न देने के इरादे के साथ पास में रखली| निशांत ये सब देख कर मन ही मन मुस्कुरा रहा था,शायद स्वामी जी के ध्यान,गहरे अनुभव,परम शान्ति इत्यादि का उदाहरण देख कर| या शायद उसे कुछ पैमाना मिल गया था तथाकथित “गहराई ” नापने का|


-सम्यक मिश्र
  जबलपुर

DHYAAN

Short Stories 0

आज देखा तुम्हें तुम थे खोये हुए
जाने किस हाल में तुम थे हँसते हुए
तुम थे रोते  हुए
आज देखा तुम्हे…………………………………..

बात कोई भी हो साथ मेरा रहे
रब से जब हो दुआ दिल तो बस ये कहे
चाहे खुशियों को मुझसे बचा लोगे तुम
पर न ग़म को मुझसे छिपा पाओगे
ज़िन्दगी में अँधेरा हो कितना घना .........
रोशनी की किरण मुझसे तुम पाओगे।
आज देखा तुम्हे……………………………………………..

दिल की गहराई से प्यार तुमसे किया
पर न तुमने ये दिल को समझने दिया
जाने क्या हैं तुम्हारी ये मजबूरियाँ
जिस वजह से हैं की तुमने ये दूरियाँ
यूँ ही मेरी मोहब्बत रहेगी जवाँ .........
चाहे तुम इस जहाँ में रहो भी जहाँ
आज देखा तुम्हे……………………………………
                                    
-मोहित खरे

AAJ DEKHA TUMHE ..

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              TERE BINA

तेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं, लगता नहीं , यारा लगता नहीं,
चेहरा भी कोई जचता नहीं, जचता नहीं , यारा जचता नहीं,
तू ख्वाबों में नींदो में, तू साँसों में धड़कन में,
ढूंढी हज़ारो दुनिया में पर मिली नहीं कोई तुझ सी हसीं ,
तेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,.....

सुन मेरी रानी, हा दिल की ज़ुबानी, छोटी सी है मेरी यह कहानी...
तुझसे शुरू, तुझपे ख़तम, अपनी तो येही है ज़िंदगानी
प्यार को मेरे ,तू रुसवाना करना, न कर यह नादानी
जीना है तो जम के जिले ,आती नहीं फिर यह जवानी
तेरे बिना रहना मुमकिन नहीं, मुमकिन नहीं यारा मुमकिन नहीं,
दूर तुझसे रह सकता नहीं, सकता नहीं यारा सकता नहीं,
तू दिन में है रातों में,तू सुबह में शामों में
खुशबू को ढूंडू चारो तरफ पर मिलती नहीं है तेर बिन कहीं
तेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,..

सुन ऐ हवा, तू धीरे मचल, होने दे तू यहां कोई हलचल,
हाथों में हो जब हाथ उसका, बीत न जाए देखो कहीं यह पल
तू ज़िन्दगी, तू बंदगी, तू ही तो  है दिल की अमानत
दिल के पिंजरे में , कैद कर लू, हॉगी न फिर कोई जमानत
तुझसे यह नज़रे हटती नहीं, हटती नहीं यारा हटती नहीं
तुझ बिन ज़िन्दगी कटती नहीं, कटती नहीं यारा कटती नहीं
खुश्बू तेरी हवाओं में,बहकी इन फिज़ाओ में
चाहु तुझको अपना कर लू पर किस्मत अपनी खुलती नहीं
तेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,....

लाल ला ला ला ला ला ला लाला। ..

tere bina

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             शक्तिपुंज मानव
गलतियां करता इंसान है
मैं कोई देव  तो नहीं
कोई गलती हो भी गई
तो छोड़ दूंगा जीना तो नहीं
हां सीख लूंगा इस बात से
जीवन में वह दोहराऊंगा नहीं
पर उस बात की आत्मग्लानि में
  वर्तमान को विनष्ट करूं 
कदापि नहीं कदापि नहीं
मेरे सोच के दायरे में
अगर वही गलती रहेगी
तो सोचूंगा कैसे रास्ते
नई मंजिलों के
मेरे मन के हर गर्त से
निकल जाना ही पड़ेगा
विचलितताओं के चिह्न सभी 
अब पुनः मैं विचलित हो
कदापि नहीं कदापि नहीं  
मेरे वर्तमान में ही
मेरे भविष्य का है द्वार जड़ा
सुंदर सुनियोजित जीवन की
प्राप्ति का सामर्थ्य भरा
मैं छोड़ता आया हूं
अतीत के रास्तों में
साथी कई ऐसे बहुतेरे
जो चल न पाए कदम मिलाए
मैं चल ना पाऊं और बढ़ जाए
वर्तमान के  साथी सभी
विवश वेदना से भरा
रहूं मैं खड़ा
कदापि नहीं कदापि नहीं 
मुझे पाना है मंजिल नई
और मुझ में है शक्ति भी
शक्ति कुछ अपनी है
कुछ स्वजनों के आशीषों की
  माना  चाहते हो  वे मुझसे
जीत जाऊं मैं अभी
पर जो मैं आज ना जी तू
तो भी है वादा मेरा
मैं जीतूंगा कभी ना कभी
हारना तो होगा उन दुर्बलताओं को
जो छीनते हैं शांति मेरी
हारना तो होगा उन गलतियों को
जो रोकते हैं कदम मेरे
हार सकता हूं मैं क्या कभी
कदापि नहीं कदापि नहीं

Shakti punj manav

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