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कोई जब कभी अपना कह कर पुकारे ,
लफ्ज़ो से रिश्तो को फिर से सँवारे ,
अगर अजनबी वो  तेरा नाम ले के,
अल्लाह के सजदों में तुमको पुकारे।।
थाम लेना हाथ उनका बिना कुछ विचारे ,
न जाने कहाँ  किसको ,किससे मिलेंगे सहारे ,
ना फूलो को चुनना ,तुम कांटो पे चलना ,
क्या पता  जीवन नदी से वही पार तुमको उतारे।।
ये जीवन नदी है ये रुकती नहीं है ,
बहुत मोड़ है लाखो तूफान भरे है,
मगर जब सहारा हो पतवार भी तो,
भंवर में भी नैया हम अपनी उतारे।।
ये धागे हैं कच्चे मगर ये ना टूटे ,
ये विश्वास की कोपलों से बने है ,
ना शब्दों की कश्ती ना रस्मो के बंधन,
समझ आया वो मेरे और हम उनके लिए है..   
बीते युगो से वो एक नाम ले कर ,
दोनों ही हम मिलते बिछड़ते रहे है ,
दीवानी थी राधा ,मीरा सखी थी ,
मुहब्बत के किस्से नए शब्द ले कर  यूँही फ़िज़ा में बिखरते रहे है।..

Muhabbat

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L C Singh

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amit verma

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