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में चला, में चला,अपनी धून में चला
ज़िन्दगी ढूंढने अपनी राहें चला..ला ला ला ला ला ला

चला चला, चला बेफिक्र,किधर है मंज़िल, नहीं है खबर (2)

गर मिल भी जाये जो मुझको मोहब्बत तो उसको  में यूँ थाम लू
कह दू ज़माने से, दिल के पैमाने से आ बस तेरा नाम लू,
बढ़ती ही जाती  है यह बेकरारी, न आता है दिल को सुकून
तेरा नशा है यह चारो  दिशाओं में, छाया यह तेरा ज़नून

हाले दिल क्या कहूँ,बिन तेरे न रहूँ
चाहत में दूरियां , इक पल भी न साहू.

सुनो सुनो, तुम दिल की सुनो,करो वही जो दिल यह कहे(२)

बंधन सारे तोड़ के, लम्हो को जोड़ के
में चला , में चला, खुशियां ढूंढ़ने.ला ला ला ला ला ला

सोचा नहीं था, कभी ऐस होगा, चमकेगी यह किस्मत मेरी.
देखा था ख्वाबों में, चाहा था बाँहों  में, वह हो जाएगी बस मेरी
दिल का यह आलम न पूछो मेरा बस,खोया है यह इस कदर
जगता हु रातों को, सोता नहीं हू,में, खुद की नहीं है खबर


मेरा  दिल खो गया,बस में अब न रहा,मांगी थी जो दुआ,हमसफ़र मिल गया


मिला मिला जो मौका तुम्हे,इसे कभी न तुम जाने दो(२)

ख्वाबों को सजाके में, नींदो को बुलाके में
में चला ,में चला, सपने करने अपने ला ला ला ला ला ला.

 

 

 

mein chala

Lyrics 0

बचपन सरल सा:
         मेरी उम्र तब लगभग ग्यारह वर्ष होगी। ननिहाल पढ़ने गया था कक्षा ६ में। पहले पहल घर से बाहर। जब बड़े भाई साहब छोड़ने गये थे तो खुश था लेकिन जब वे मुझे छोड़कर वापिस जा रहे थे, मेरी आँखें डबडबाने लगीं। अक्टूबर की छुट्टियों में घर आया था। तब बचपन में पढ़ने की रुचि कम ही हुआ करती थी। दस पास करना बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। गणित और अंग्रेजी बहुतों को फेल करने के कारण होते थे। छुट्टियाँ समाप्त हुयीं और ईजा (माँ) ने सामान तैयार कर रवाना कर दिया।बहुत बुरा लग रहा था बचपन छोड़ने में। चौखुटिया पहुंचा और सोचा द्वाराहाट के रास्ते जाऊं। बस का टिकट लिया, तब साठ पैसे का टिकट हुआ करता था। द्वाराहाट में भाई साहब पढ़ते थे। वहाँ चला गया। वे स्वयं ही खाना बनाते थे। उस दिन जिस बर्तन में चावल बना रहे थे वह उल्ट गयी। उनके स्कूल में हड़ताल चल रही थी। एक रात वहाँ रूककर दूसरे दिन ननिहाल की ओर चल पड़ा। चलते-चलते दिमाग दौड़ने लगा।रास्ते में एक प्राथमिक विद्यालय आया। विद्यालय के चारों ओर चारागाह था जिसमें गायें चर रही थीं।मैंने प्राथमिक विद्यालय की ओर देखा। दिमाग चल रहा था।पढ़ने में मैं अच्छा था पर उसके महत्व को नहीं समझता था।कक्षा ५ में अपने केन्द्र में मेरा स्थान प्रथम था। उधर गायें चर रही थीं, प्राथमिक विद्यालय ऊंची जगह पर था। मैं सोच रहा था क्यों न अपने स्कूल में भी काल्पनिक हड़ताल करा दी जाय। हड़ताल घोषित कर दी मन ही मन। और आगे जाने की जगह पीछे मुड़ लिया। द्वाराहाट बस स्टेशन पहुंचा और बस में बैठकर चौखुटिया पहुंच गया। चौखुटिया पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी थी। वहाँ हमारे गांव के एक दुकानदार थे। रात उनके यहाँ बीतायी। जो सामान ईजा ने भेजा था उसे उनके यहाँ रख दिया। उन्हें पूरी कहानी बताकर और उन्होंने विश्वास कर लिया। घर को रवाना हुआ और नदी के किनारे आराम से चला जा रहा था। एक जगह मछली पकड़ने को मन हुआ तो पकड़ने के लिए नदी पर गया। काफी कोशिश की पर असफल रहा। शाम को घर पहुंचा। बोला स्कूल में अनिश्चितकालीन हड़ताल हो गयी है। कब खुलेंगे पता नहीं। घरवाले भी मान लिये।. भला, इतना छोटा बच्चा इतना बड़ा बहाना कैसे बना सकता है? वैसे भी प्रारंभ से ही बोला गया है," सत्यमेव जयते।"  इसका मतलब झूठ की बहुतायत हमेशा रही है इसलिए कहना पड़ा ," सत्यमेव जयते।"  ईजा ने पूछा," तेरी अम्मा क्या कह रही थी? मैंने कहा," कुछ नहीं। " मन ही मन सोच रहा था जब वहाँ गया ही नहीं तो क्या कहेगी। फिर बोली खबरबात कैसी है वहाँ की? मैं बोला,"सब ठीक है।"  सब कुछ एक माह तक ठीक ठाक चला। खूब खेला कूदा। बीच बीच में बात उठती यह कैसी हड़ताल है जो टूटती नहीं। मैं चुप रहता। एक दिन ईजा खबर लायी कि ये तो वहां गया ही नहीं। हड़ताल -वड़ताल कुछ नहीं हो रखी है। आधे रास्ते से लौट आया था। खबरची मेरे ताऊ का बेटा था। उनका ससुराल वहां था। वे वहाँ गये थे तो उनको सब पता चल गया। अब मैं घर की अदालत में बिना वकील के खड़ा था। मुझे फिर से ननिहाल भेज दिया गया। हमारे अंग्रेजी के अध्यापक जब हमें पढ़ाते थे तो उनके मुँह से छर्रेदार थूक निकलता था। अत: कक्षा में जब नजदीक आते थे तो सजग होना पड़ता था नहीं तो थूक मुँह पर गिरने की पूरी संभावना रहती थी।तब बीड़ी,सिगरेट और तम्बाकू पीने का शौक पैदा हो गया था।एक साल में ही इस शौक ने दम तोड़ दिया। स्कूल मिडिल स्कूल कहलाता था जहाँ कक्षा ६,७ और ८ की शिक्षा दी जाती थी। उस समय की सामाजिक स्थिति में लड़कियों की शिक्षा का महत्व बहुत कम था। हमारे विद्यालय में उन दिनों एक भी लड़की नहीं थी। लड़कियों को कक्षा ५ तक ही पढ़ाया जाता था या पढ़ाया ही नहीं जाता था। घर का काम ही उनके हिस्से आता था। हालांकि, साक्षरता प्रतिशत उस समय लगभग तीस के आसपास रहा होगा। गर्मियों में सुबह का स्कूल हुआ करता था। एक बजे जब छुट्टी होती थी हम पास बहती नदी में नहाने जाते थे। पानी में पिताड़ ( जोंक की एक प्रजाति) होते थे जो शरीर पर ऐसे चिपक जाते थे कि निकालना कठिन हो जाता था। पास ही शिवालय भी था। वहाँ पर एक घट(पनचक्की) था, कुछ दूरी पर श्मशान। घट जब आते थे तो बहुत साथियों और लोगों से भेंट होती थी। लेकिन जब सूर्यास्त होने लगता तो श्मशान का डर मन में आने लगता था। माना कि भूतों का साम्राज्य आने वाला है।
इसी क्रम में-
मेरी छाया कब लम्बी हुई
और कब छोटी
पता ही नहीं चला,
जब तुम्हारे सामने चुप बैठा था
तब भी बहुत कह रहा था,
जैसे मूक वृक्ष कहते हैं
फल-फूलों के बारे में,
मूक मिट्टी कहती है
अन्न के विषय में,
मूक राहें कहती हैं
यात्राओं के बारे में।
*** महेश रौतेला

Bachapan Saral Saa

Short Stories 0

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल एक गाना नहीं
जीवन की जयगाथा है।

हिन्दी केवल एक वर्ग नहीं
विविधताओं का भंडार है
हिन्दी केवल एक तर्क नहीं
समीक्षाओं का संसार है।

हिन्दी बहुत सरल है
प्रकृति जिसकी तरल है
संवेदनाओं की भूमि में
यह परिपक्व फसल है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
संवैधानिक एक पर्व है
हिन्दी केवल राजभाषा नहीं
गणतांत्रिक यह गर्व है।

हिन्दी केवल एक बोली नहीं
चिंतन की यह उपमा है
हिन्दी केवल एक मोती नहीं
मंथन की यह महिमा है।

अभिव्यक्ति का अंश है
यह न कोई अपभ्रंश है
आदिकाल से भी आदि
सभ्यताओं का वंश है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की यह ज्वाला है
हिन्दी केवल परिभाषा नहीं
सृजन का यह प्याला है।

हिन्दी केवल एक संकाय नहीं
ज्ञान की यह दृष्टि है
हिन्दी केवल एक पर्याय नहीं
सम्मान की यह सृष्टि है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं
के साहित्यिक पतन रोकती यही
पठन-पाठन अतिसुंदर लेखन
लोक-लुभावनी लोकोक्ति यही।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिज्ञासा है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
मन की महत्वाकांक्षा है।

हिन्दी केवल एक मंत्र नहीं
आध्यात्मिक अनुनाद है
हिन्दी केवल एक छंद नहीं
यह आत्मिक अनुवाद है।

अनुदार नहीं बहुत उदार है यह
उद्वेलित मन का उपहार है यह
वैचारिक व्याकरण से सुसज्जित
हृदय का उद्दीप्त उद्गार है यह।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिजीविषा है
हिन्दी केवल अभिलाषा नहीं
सृजन की सही दिशा है।

हिन्दी केवल एक मुक्तक नहीं
मर्म की मधुशाला है
हिन्दी केवल एक पुस्तक नहीं
कर्म की पाठशाला है।

राष्ट्रीय गौरव है यह
शासकीय सौरव है यह
क्लिष्ट और कर्कश नहीं
मधुर कलरव है यह।

हिन्दी केवल एक पथ नहीं
चिंतन की उपमा है
हिन्दी केवल एक रथ नहीं
मंथन की महिमा है।

हिन्दी केवल चलचित्र नहीं
अभिव्यक्ति का संगीत है
हिन्दी केवल एक क्षेत्र नहीं
अनुभूति का यह गीत है।

हिन्दी केवल एक प्रदेश नहीं
बल्कि संपूर्ण भारत है
हिन्दी केवल राजआदेश नहीं
बौद्धिक अभिभावक है।

हिन्दी केवल शब्दकोश नहीं
विधाओं का विस्तार है
हिन्दी केवल ज्ञानकोश नहीं
मेधाओं का मल्हार है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
कवि की कविता है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
रवि की सविता है।

हिन्दी केवल एक अक्षर नहीं
यह विशिष्ट योग्य वर्ण है
हिन्दी केवल हस्ताक्षर नहीं
अपितु हृदय का दर्पण है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल राष्ट्रभाषा नहीं
जीवन की महागाथा है।।

-राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

Hindi kewal ek b..

Poems 0

तसव्वुर में मेरे आजकल तुम्हारी तस्वीर चलती है
काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि तस्वीर उभरती है।

तेरी तस्वीर जब भी देखता हूँ, ख़यालों में खो जाता हूँ
मैं कुछ नहीं लिखता हूँ, तेरी तस्वीर मुझसे लिखवाती है।

तेरी रूह, तेरा नक़्श, तेरा नाम, सब चाँदी जैसे सफ़ेद हैं
दिल के अंधेरे कमरे में, तू रौशन कोई खिड़की लगती है।

तेरी खुशबू का अंदाज़ा तो इस बात से मालूम चलता है
कि जिस गली से गुज़रे तू, वो गली फूलों सी महकती है।

तेरे आने से मेरी ज़िंदगी का अधूरापन अब खत्म हुआ
ज़िंदगी पहले के बजाय इन दिनों ज्यादा मुस्कुराती है।

मुझे ये ख़बर है कि तुम्हें मेरे फ़ितूर की कोई ख़बर नहीं
सुन ओ बेख़बर, तेरी तस्वीर तो मेरी आँखों में बसती है।

दुआओं की दरख़्वास्त है, ये जुदाई नाकाबिले बर्दाश्त है
सुना है कि दुआओं से तक़्दीर की तस्वीर बदल जाती है।।

Tasawwur mein mere

Poems Sher-o-shayari 0

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