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गाँव का  एक अधेड़ उम्र का लगभग जीर्ण शरीर व्यक्ति रामसुख अपनी बेटी अनीता के साथ जंगले में लकड़ी काट रहा था । तभी उन दोनों को एक लड़की दिखाई दी जो पेड़ो की आड़ में  अपने आप  को छुपाते हुए भागने की कोशिश कर रही थी । उसने जींस और  टी-शर्ट पहन रखा था जिससे उसका शहर की   होने का आभास होता था । उस लड़की ने जब उन दोनों बाप बेटी को देखा तो दौड़ कर उन दोनों के पास आ गयी , और हेल्प मी हेल्प मी कहने लगी । वे दोनों बाप बेटी इस अंग्रेजी शब्द का मतलब तो न समझ सके, लेकिन उसके घबराये हुए चेहरे से इतना अनुमान लगा लिए की वह किसी मुसीबत में है । तभी उन लोगो को उस लड़की के पीछे  एक लड़का आता हुआ दिखाई दिया । जिसे  देखकर उन लोगो को सारा माजरा समझते देर न लगी। उस लड़की ने भी पास आकार बताया की ये लड़का मेरा पीछा कर रहा है । तब उन दोनों बाप बेटी  ने उस लड़की को दिलाशा दी  की अब तुम्हे कुछ नहीं होगा तुम चिंता मत करो  ".
उसके बाद उस अधेड़ ने अपनी बेटी अनीता से कहा की तुम इस लड़की को लेकर यहाँ से भाग जाओ "  बाकी मै  सम्हाल  लूँगा ।
"पहले तो उसकी बेटी  उसे छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुई " लेकिन  बाप के ज्यादा जोर देकर कहने पर वह वहां से जाने को तैयार हुई । तब तक वो लड़का भी रामसुख के पास आ पहुंचा "
वह राम सुख को धक्का देते हुए उन लड़कियों का पीछा करने के लिए आगे बढ़ा । "लेकिन  अगले ही पल रामसुख ने उसका रास्ता रोक लिया ।
"और फिर दोनों में संघर्ष होने लगा "
लेकिन जीर्ण जिश्म रामसुख उस नौजवान लड़के का सामना ज्यादा देर तक नहीं कर सका , और  वह लड़के द्वारा घायल होकर गिर गया ।
"वह लड़का अब रामसुख को वही पर छोड़, उन लड़कियों को ढूढ़ने  के लिए आगे बढ़ा " लेकिन तब तक वो लड़कियां उसकी पहुँच से बहुत दूर निकल चुकी थी । वो लड़का थोड़ी देर उन लड़कियों को यहाँ -वहाँ  ढूंढा , लेकिन कही न पाकर लौट गया ।
"अनीता उस लड़की को लेकर एक सुरक्षित स्थान पर पहुंची"
"वहां पहुंचकर अनीता ने उस लड़की का पसीना पोछते हुए उसे  ढाढस बंधाया की अब तुम यहाँ बिलकुल सुरक्षित हो "
उसके बाद अनीता ने उस लड़की का परिचय पूँछा  ।
लेकिन वो लड़की अभी भी डर  से काँप रही थी । वह  कुछ बताने की स्थिति में नहीं थी ।
जब अनीता ने उस लड़की को इतना डरा हुआ देखा तो उसने  उसे गले से लगा लिया और सांत्वना देने लगी ।
" जब लड़की थोड़ी देर बाद  समान्य हुई तो उसने अपना परिचय बताया  "
"उसने बताया की उसका नाम नीलम है । गाँव के विशम्भरदास शर्मा उसके मामा है । लेकिन मेरा घर दिल्ली  में है। मै  पापा मम्मी के साथ दिल्ली शहर मेही रहती हूँ , और  मै वही पर  पढ़ती हूँ "
"लेकिन इस समय गर्मियों में स्कूलों की छुट्टियाँ चल रही है । इसलिए मै गरमियों की छुट्टियों में मामा के यहाँ गाँव घुमने आई थी ।
आज मै  अपनी एक सहेली के साथ नदी के किनारे घूमने गयी थी ।  मै नदी का नजर नजारा देखने के लिए एक जगह ठहरी रह गयी , लेकिन मेरी सहेली मुझसे आगे निकल गयी । और तभी  उसी समय ये लड़का आया और मेरा मुह दबाकर  मुझे जबरदस्ती जंगल की तरफ उठाकर ले गया। शायद ये लड़का हम लोगो का पीछा पहले से ही कर रहा था । लेकिन मै किसी तरह इसके चंगुल से अपने आप को छुड़ाकर भागी , और भागते भागते यहाँ तक आ पहुंची । आप लोगो ने मुझे उस दरिन्दे के चंगुल से बचाया "'इसका आप लोगो का बहुत बहुत शुक्रिया "''
अनीता ने कहा इसमें शुक्रिया अदा करने की कोई जरूरत नहीं है । आखिर मै  भी तो एक लड़की हूँ ।
"लेकिन तुम बहुत किस्मत वाली हो जो इस  हैवान के चंगुल से बच निकली " वरना  हर लड़की की किस्मत ऐसी कहाँ जो इस वहसी दरिन्दे के चंगुल से बच पाई हो । अनीता ने कहा .............."
नीलम :    तो  क्या तुम इस लड़के को जानती हो ..........?
अनीता :    हाँ नीलम इस दरिन्दे को कौन नहीं जानता ,  यह एक अमीर बाप की एक  बिगड़ी औलाद है । यह वो दरिंदा है जिसने कई  मजबूर, गरीब  और लाचार लड़कियों की जिंदगी बर्बाद की है । इसे कोई कुछ भी नहीं बोलता । क्यूंकि बाप पैसो के दम पर कानून और पुलिस को जेब में रखता है तो बेटा  डरा धमका कर लोगो का मुह बंद रखता है ।"
नीलम :  लेकिन अब इसकी गुंडा गर्दी नहीं चलेगी । मै अपने मामा से बोलकर इसकी खबर लूंगी । यह शायद मेरे मामा को जानता  नहीं है की मेरे मामा कौन है । वे इस गाँव के प्रधान है । जब वे जानेंगे की इसने मेरे साथ ऐसा सलूक किया तो वे इसे जीता नहीं  छोड़ेंगे ।
अनीता :     (हिचकिचाहट भरे स्वर में )   क्या ........?........तुम्हारे  मामा ................... ???????
"इतना कहकर अनीता ने आगे कुछ नहीं बोला "
नीलम :    क्या हुआ । तुम कुछ बोलने वाली थी ........
अनीता :   नहीं , कुछ  नहीं ।
नीलम :   ओके ....... प्लीज़  क्या तुम मुझे, मेरे घर तक छोड़ सकती हो ।
अनीता :   लेकिन मै  तुम्हारे साथ गाँव तक नहीं जा सकती ।
नीलम  :   क्यों ........
अनीता :    गाँव में प्रवेश के लिए मेरे ऊपर प्रतिबन्ध लगा हुआ है । इसलिए मेरा घर भी गाँव से बहार इस जंगले में बना हुआ है ।
नीलम :     ( आश्चर्य भरे स्वर   में )  कैसा प्रतिबन्ध ......?
अनीता :    ये जानने  के लिए तुम्हे मेरी कहानी सुननी पड़ेगी, लेकिन  तुम्हे घर जाना होगा इसलिए चलो मै  तुम्हे गाँव के पास तक छोड़ देती हूँ उसके बाद तुम चली जाना ।
नीलम :   लेकिन अब तो मै  तुम्हारी कहानी सुनाने के बाद ही यहाँ से जाउंगी ।"
अनीता :  तो ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी "
                           " उसके बाद अनीता ने जो दास्तान नीलम को बताई वह स्वत्रन्त्र भारत के गौरव गाथा की धज्जियाँ उड़ा  देनी वाली थी। उसे सुनकर तो ऐसा लग रहा था की यहाँ एक भारत नहीं बल्कि दो भारत है । भारत तो अंग्रेजो की गुलामी से निजात पा चुका  था । लेकिन इस भारत के अन्दर एक और भारत  भी है जो अभी भी गुलाम बना हुआ है । जिसकी हुकूमत रसूखदारों धर्म के ठेकेदारों और जमींदारो के हांथों में है । अनीता भी उसी दूसरे भारत की निवासी  थी । जिसकी बागडोर ऐसे ही  लोगों के हाथों में थी । उस भारत में अनीता का समाज आज भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था ।
अनीता ने बताया की पहले उसका भी घर गाँव में ही था । घर में माँ -बाबूजी और मुझसे चार छोटे भाई बहन थे।  बाबूजी  लकड़ियाँ काटकर कर बाजार में  बेंचा करते थे, तो माँ लोगो के घरों मे काम किया करती थी।  जब मै  तेरह साल की थी , तभी मेरी माँ का निधन हो गया ।  अब घर में कमाने वाले सिर्फ बाबूजी थे । परिवार बड़ा था इसलिए बाबूजी का अकेले कमा कर  घर का खर्च चला पाना मुस्किल  था । इसीलिए थोड़े दिनों बाद बाबूजी  मुझे भी साथ लेकर काम पर जाने लगे । जब मै बाबूजी के साथ काम पर जाती तो लोग बाबूजी को बोलते की रामसुख तुम्हारी बेटी तो बहुत सुन्दर है । ऐसी फूल जैसी बेटी से काम क्यों करवाते हो ।
तो बाबूजी बोलते की क्या करें सुन्दर होने से पेट थोड़े ही न भरता है । भूंखे और गरीब  के लिए सुन्दरता के कोई मायने नहीं होते । अगर भगवन ने इसे मजदूर के घर जन्म दिया है तो काम तो करना ही पड़ेगा । जब मै थोडा और बड़ी हुई तो मेरा रास्तों से निकलना मुस्किल हो गया । रास्तों   से निकलती तो लड़के तरह -तरह की फब्तियां  कसते थे ।
मेरी खूबसूरती को ग्रहण तब लग गया जब गाँव के ही एक लड़के बबन की निगाह मुझपर पड़ी । यह बबन कोई और नहीं बल्कि यही  लड़का था जो आज तुम्हारे पीछे पड़ा था । यह एक आवारा  किस्म का लड़का है । दिन भर गाँव में इधर उधर घूमना । अनायस ही लोगो से लड़ाई झगडा करना , रास्ते से निकलती हुई लडकियों को छेड़ना इसका पेशा है ।
अब बबन मुझे भी परेशन करने लगा था । कभी मुझे रास्ते में रोकता तो कभी मेरा दुपट्टा खींच  लेता। मै परेशान  थी की , मै  क्या करूं । अगर मैंने किसी को बताया तो मेरी बेइज्जती होगी।  इसी डर  के मारे मै  किसी  से कुछ नहीं बोलती थी ।
लेकिन एक दिन तो हद हो गयी । मै  जंगल में लकड़ी काटने गयी थी । तभी मोहन वहां अपने एक दोस्त के साथ आया, और पैसे का प्रलोभन देते हुए कहा की अगर मै उसके मन की इच्छा पूरी करने दूँ तो वह मुझे पैसे से मालामाल कर देगा । लेकिन मैंने मना किया और उसे भला बुरा कहकर उसे वहाँ  से चले जाने के लिए कहा ।
"लेकिन वो नहीं माना "
उसके बाद वो मेरे साथ जबरदस्ती करने लगा । उन दोनों ने मिलकर मेरे कपडे फाड़ दिए । मै किसी तरह शोर मचाते हुए वहां से भागने में कामयाब हो गयी । और घर आकर सारी बात बाबूजी को बताई । तो बाबूजी ने इसकी शिकायत गांव के प्रधान जी  से की ।
प्रधान जी ने रात में ग्राम सभा बुलाई । पंचायत में सभी लोग आये । लेकिन वहां पर मेरे साथ न्याय होने के बजाए  सारा आरोप मुझपर ही थोप दिया गया । मुझपर यह इल्जाम लगाया गया कि जंगल में मैंने ही बबन को पैसे ऐठने के लिए बुलाया था लेकिन जब शरीफ बबन  इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो मैंने खुद अपने कपडे फाड़कर  उस पर बलात्कार का आरोप लगा दिया ।
यहाँ तक तो ठीक था । लेकिन  उन लोगों ने भरी सभा में  मेरे बारे और भी पता नहीं  न जाने  में क्या क्या कहा ।  जैसे   किसी ने कहा की मेरी जवानी अब मुझसे सम्हल  नहीं रही  , तो किसी ने कहा की यह गाँव में व्यभिचार फैला रही है । इसके कारण  ही गाँव के लड़के बिगड़ रहे है । इस तरह के आरोप मुझ पर लगाये गए ।
उसके बाद प्रधान जी ने मुझे  गाँव से बहार जंगल में घर बना कर रहने की सजा दी । जिससे इस तरह की समस्याये मेरे कारण  गाँव में पैदा न हो । यह सुनकर वे लोग कुछ ज्यादा ही खुस हुए जो यह कह रहे थे की मै  गाँव के लडको को बर्बाद कर रही हूँ । और मुझे यह भी हिदायत दी गयी की, मै  अब कभी भी  इस गाँव की दहलीज पर कदम न रखूं । मुझे गाँव के अंतर्गत आने वाले  जलासयों से पानी भी भरने के लिए मना किया गया ।
खैर उसके बाद बाबूजी हम बच्चों को लेकर गाँव से बाहर, यही जंगल में  घर बनाकर रहने लगे । मै बाबूजी के साथ अब दूसरे गाँवो  में मजदूरी के लिए  जाने लगी । लेकिन थोड़े दिनों बाद  बाबूजी बीमार पड़ गए तो मै  अकेले ही मजदूरी करने  के लिए जाने लगी।
"एक दिन रास्ते में जाते वक्त  बबन मुझे फिर से मिला। उसने मुझे अकेला पाकर  अपने मंसूबो को वो अंजाम दिया , जिसे वह बहुत दिनों से पूरा नहीं कर पाया था । मै  भी  चीखी, चिल्लाई ,रोई लेकिन  कुछ भी न कर पाई । और तब से लेकर आज तक मई उसकी वासना का शिकार बन रही हूँ । जब भी  उसका मन करता है मनमानी करके चला जाता लेकिन मै  कुछ भी नहीं कर पाती । कौन है मेरी सुनने वाला .....कोई भी नहीं .......। अब तो लोग मुझे उसकी रखैल के नाम से भी जानने लगे है।  इसी कारण आज  मेरे समाज का कोई भी  लड़का मुझसे शादी करने को तैयार नहीं है । इतना कहकर अनीता फफक फफक कर रोने लगी ।
नीलम ने उसे गले से लगाकर ढाढस बंधाया । लेकिन वो खुद भी रो रही थी ।
उसे हैरानी हो रही थी अपने प्रधान मामा के न्याय पर जो उन्होंने एक गरीब लड़की को दरिंदो के जुल्म का शिकार होने के लिए जंगल में घर बना कर रहने का फरमान सुना दिया । नीलम को लगने लगा था की मेरे मामा भी अनीता की दुर्दशा के लिए उतने ही जिम्मेदार है जितना की बबन ।
नीलम ने अनीता के आँसू पोछते हुए कहा की अनीता आज तुम भी मेरे साथ गाँव चलोगी । अब तुम मुझे अपनी बहन समझो । तुम्हे कुछ नहीं होगा अब ।
अनीता ने कहा : लेकिन नीलम मेरे खातिर तुम परेशानी मत उठाओ तुम अकेले ही घर जाओ । मै नहीं चाहती की मेरे कारण तुम्हे तुम्हे कोई समस्या हो ।
नीलम : नहीं अनीता तुम्हारे साथ जो अत्याचार हुए है और हो रहे है । अब नहीं होंगे उनसे तुम्हे छुटकारा दिलाना अब मैंने अपना फ़र्ज़ मान लिया है । आखिर तुम लोगो ने भी तो मुझे उस दरिंदे से बचाया है आज ।  इसलिए आज तुम मेरे साथ मेरे घर चलो । तुम्हे कुछ नहीं होगा । मेरा भरोषा करो अनीता ।"
   ""नीलम के भरोषा दिलाने के बाद अनीता नीलम के साथ गाँव में उसके घर गयी । वहां पहुंचकर उसने  देखा की नीलम के घर में नीलम की उपस्थिति न होने के कारन घर में कुहराम मच हुआ है । लेकिन नीलम को देखते ही सब लोगो की जान में जान आ गयी । वे लोग दौड़कर नीलम के पास आये । और खैर खबर पूछने लगे । लेकिन प्रधान जी ने जब नीलम के बगल में अनीता को खड़ा  देखा तो उनकी भौहें गुस्से से तन गयी । और कड़कती अवाज में कहा की तू नीच लड़की यहाँ पर क्या कर रही है ।
"तभी बीच में ही नीलम बोल पड़ी मामा जी अब आप इसे नीच मत बोलना , क्यूंकि जिसे आप नीच बोल रहे हैं आज उसी की वजह से आपकी इज्जत नीची होते-होते बची है । और उसके बाद  नीलम ने सारी दास्तान अपने  मामा जी को  सुना दिया।
यह सब सुनकर प्रधान जी अंतरात्मा उन्हें अंदर से झकझोर उठी । वे आज सच्चे मायने में इंसान बन चुके थे । उन्हें अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था ।
लेकिन पछतावा बस करने से उनके पापी कर्मो का अंत नहीं हो सकता  । यह सोचकर उन्होंने अनीता और उसके पिता से माफ़ी मांगते हुए उन्हें सम्मान सहित गाँव में फिर से बसाया । उन्होंने एक अच्छा लड़का देखकर अनीता की शादी करवाई और कन्यादान उन्होंने स्वयं अपने  हाथ से किया ।
उसके बाद उन्होंने बबन को क़ानूनी सजा दिलवाई । और आज अनीता अपने घर परिवार गाँव में जहाँ खुशहाल  जिंदगी बिता रही है वही  बबन जेल की सलाखों के पीछे जिंदगी काट रहा है ।
::::::::::::::::--------------------समाप्त ..........................:::::::::::::::::::::::::::












 

 

Ijjat Meri Bhi

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जागती आँखों से देखा एक ख्वाब था,तारों की छांव में वो सपना पल रहा था
पलकें उठती और गिरती थी हर पल,अरमान वो लेकिन जग रहा था।
एक ऐसे साथी की थी हमें तलाश.जो सिर्फ हमें चाहेगा
जो आएगा ज़िदगी में खुशी बनकर और वक्त थम सा जाएगा।
मन की इस बगिया ने एक ऐसा सपना संजोया,एहसास के बीज को हर पल बोया
कौन है वो जो सपनों सा होगा,जो जीवन को पूरा करेगा।
कोई ऐसा आए ज़िदगी में जो जान बने हमारी,
जिसे चाहे इतना हम,वो आत्मा बने हमारी।
प्यार की राहें होती हैं मुश्किल
चलना उसी के साथ था जो साथ दे पलछिन
वक्त गुजरता गया,एहसास कभी न हुआ
लगता था जैसे, सपना सिर्फ सपना हुआ।
किस्मत का लिखा किन्तु कोई बदल नहीं सकता
हाथों की लकीरों को मिटाया नहीं जा सकता।
आया जि़दगी मे कोई,वही सपना बनकर
जो ख्वाबो में सोचा था,वही अपना बनकर।
दिल ने उसे एक पल में जान लिया,
बिन सोचे अपना मान लिया
रब से हमें एक अनमोल तोहफा मिला
उसके रूप में एक सच्चा हमनवां मिला।
एक पल भी जुदा हो वो तो वक्त सदी सा लगता है,दूर होने की सोच से भी अब हमको डर लगता है
जीना मरना उसके साथ,सांसो की डोर वो
आज हर सपना सच्चा सा लगता है।

Ek Sapna Sachha Sa

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चालीस साल पहले:
मुझे  उसका चालीस साल पहले का पहनावा याद है।क्यों ऐसा है पता नहीं! हल्के पीले रंग की स्वेटर। खोजी सी आँखें और गम्भीर चेहरा। मुस्कान अछूत सी।
अपने अन्य दोस्तों का पहनावे का कोई आभास नहीं हो रह है। यहाँ तक की अपने कपड़ों का भी रंग याद नहीं है।
दोस्त अजनबी बन जाते और अजनबी दोस्त।
एक दोस्त को फोन किया। बातें होती रहीं जैसे कोई नदी बह रही हो, कलकल की आवाज आ रही थी पुरानी बातों की। वह डीएसबी, नैनीताल पर आ पहुँचा। बीएससी प्रथम वर्ष की यादें उसे झकझोर रही थीं। गणित वर्ग में हम साथ-साथ थे पर दोस्ती के समूह तब अलग-अलग थे। उस साल बीएससी गणित वर्ग का परिणाम तेरह प्रतिशत रहा था। वह बोला," आप तो अपनी मन की बात कह देते थे लेकिन मैं तो किसी को कह नहीं पाया। दीक्षा  थी ना।" मैंने कहा ," हाँ, एक मोटी-मोटी लड़की तो थी,गोरी सी।" वह बोला," यार, मोटी कहाँ थी!" मैं जोर से हँसा। फिर वह बोला," उसने बीएससी पूरा नहीं किया। वह अमेरिका चली गयी थी।" मैंने कहा," मुझे इतना तो याद नहीं है और मैं ध्यान भी नहीं रखता था तब।" मेरे भुलक्कड़पन से वह थोड़ा असहज हुआ।मैंने किसी और का संदर्भ उठाया, बीएससी का ही। वह विस्तृत बातें बताने लगा जो मुझे पता नहीं थीं। फिर उसने कहा कभी मिलने का कार्यक्रम बनाओ। दिल्ली में रेलवे स्टेशन पर ही मिल लेंगे एक-दो घंटे। मैंने कहा तब तो मुझे एअरपोर्ट से रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा या फिर रेलगाड़ी से आना पड़ेगा। उसने कहा," एअरपोर्ट पर ही मिल लेंगे।" मैं सोचने लगा मेरा दोस्त ऐसा क्यों बोल रहा है? अक्सर, हम किसी परिचित को घर पर मिलने को कहते हैं। नैनीताल में तो कई बार एक ही बिस्तर पर सोये थे।
सोचते-सोचते सो गया।रात सपने में यमराज आये। बोले, मुझे एक सूची बना कर दो।मैं उन्हें देखकर पहले तो बिहोश होने वाला था पर फिर संभला और पूछा कैसी लिस्ट। वे बोले उसमें केवल नाम होने चाहिए, स्वर्ग में कुछ जगह रिक्त हैं। मैंने उन्हें चाय के लिये पूछा। वे कुछ दोस्ताना दिखाने लगे। मैंने उन्हें चाय दी। चाय पीकर वे चले गये। मैं तैयार हुआ और जो मिलता उससे पूछता," स्वर्ग जाना है क्या?" जिससे भी पूछता वह मुझ पर नाराज हो जाता। जब थक गया तो अपने मन से सूची में नाम डालने लगा। नाम इस प्रकार थे-गंगा,यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नन्दा देवी, हिमालय,  आदि। नींद टूटी तो सोचने लगा-
"सपना देखना चाहिए
मनुष्य बनने का,
यदि मनुष्य ही न बन पाये
तो राष्ट्र कैसे बनेगा?
राम बने थे
तभी राम राज्य आया था।"
एक बार महाविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाटक होना था। लोकेश उस नाटक को निर्देशित कर रहा था। मल्लीताल में उसका घर था। नाटक के सिलसिले में एक-दो बार मैं उसके घर भी गया था।उसे नाटकों का बहुत शौक था। उन दिनों लड़की का अभिनय लड़के भी कर लेते थे। लड़कियाँ कम होती थीं और अभिनय के प्रति कम उत्सुक रहती थीं।उस नाटक में एक लड़की का भी किरदार था। उस समय तक मैंने दिनकर जी की उर्वशी नहीं पढ़ी थी और न नोबेल पुरस्कार प्राप्त लोलिता का जिक्र सुना था। नोबेल कमेटी को उपन्यास इतना अच्छा कैसे लगा होगा, पता नहीं। बहरहाल, लोकेश ने मुझे एक सूची दी और कहा लड़कियों से ये सामान लेना है। मैं लिस्ट लेकर लड़कियों के पास गया। लिस्ट एक -एक कर वे देखने लगीं और आँखें नीचे करती गयीं। मुझे बाद में पता चला की उसमें "ब्रा" भी लिखी हुई थी तब तक मैं उससे अनभिज्ञ था, क्योंकि उस जमाने में गांवों में महिलाएं उसका उपयोग नहीं करती थीं। मैं बिना उनकी सहमति के लौट आया। बाद में मेरे एक दोस्त को उनमें से एक लड़की ने सभी परिधान देने की सहमति जतायी, लेकिन बोली थी कि किसी को नहीं बताना। उसने यह भी बताया कि एक लड़की बोल रही थी," मैं तो नहीं दूँगी।"   हम लोग शाम को छात्रावास गये और उससे सामान लिया और नाटक का सफल मंचन किया।
कार्यक्रम देखते-देखते बहुत देर हो गयी थी। लगभग रात का एक बज गया था। मैं हाँल से निकला और तेज कदमों से अपने आवास की ओर चलने लगा। मन में डर घर कर रहा था,अंधेरे का, भूतों का।बचपन के भूत ऐसे समय ही याद आते हैं। और हर ऊँचा पत्थर  व झाड़ियां भूत जैसे दिखते हैं।नैनीताल की ठंड बदन को कंपकंपा रही थी।आधे रास्ता तय हो चुका था। एक कोठी मुझे दिखायी दी, उसमें एक लालटेन जल रही थी। मुझे आगे जाने का साहस नहीं हुआ। मैं उस कोठी की ओर बढ़ा और दरवाजा खटखटाया। एक बुढ़िया अम्मा ने दरवाजा खोला। मैंने उनसे पूछा," रात बीताने के लिए जगह मिल सकती है, अम्मा।" बुढ़िया खुश होकर बोली क्यों नहीं बेटा। अपना ही घर समझो। मैं अन्दर गया। उसने मेरे सोने के लिए मखमली बिस्तर तैयार कर दिया। और स्वंय बगल के कमरे में बिना बिस्तर के लेट गयी। मैं बिस्तर में करवटें बदल रहा था। बुढ़िया बीच-बीच में पूछती," बेटा सो गया?" मैं कहता नहीं, नींद नहीं आ रही है। एक घंटे बाद वह फिर बोली,"बेटा सो गया?"  मैं चुप रहा। तो मैंने देखा वह मेरी ओर आ रही है। जैसे ही नजदीक पहुंची मैंने कहा नहीं अभी नहीं आयी है। यह सुनते ही वह झट से लौट गयी। मेरे अन्दर डर बैठने लगा। लगभग सुबह पाँच बजे वह फिर बोली,"बेटा सो गया?" मैंने कहा नहीं। सबेरा होने वाला है अतः चलता हूँ। वह मेरे पास आयी और अपने हाथ से मेरे हाथ को पकड़ने लगी। मुझे लगा जैसै हड्डियां ही हड्डियां मेरे हाथ को जकड़ रही हैं। मैंने हाथ खींचा और घर की ओर तेज कदमों से निकल पड़ा। दूसरे दिन रात की बात मैंने अपने पड़ोसियों को बतायी तो वे बोले वह भूतुआ कोठी है।कहते हैं वहाँ एक बुढ़िया रहती है जो नींद में लोगों को मार देती है। मैं उनकी बातें सुन पसीना-पसीना हो गया। दूसरे दिन दो घंटे ही कार्यक्रम देखा।एक नाटक देखा जिसमें महिला का पति युद्ध में शहीद हो जाता है और महिला को सरकार से बहुत रुपये मिलते हैं और वह अपने सास-ससुर को छोड़ दूसरी शादी कर लेती है।दूसरी शादी के बाद भी वह पेंशन लेती रहती है। नाटक चल रहा होता है लेकिन मेरे मन में गत रात की घटना घूम रही है कि कोई बोल रहा है," बेटा, नींद आ गयी?"

Chalis saal pahle

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